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Saturday, December 25, 2010

(अमन वर्मा नहीं बल्कि) अमन कैसे आयेगा ?

शरीफ लोग तो शराफ़त से ही रहते आये हैं लेकिन शरारत करने वालों को जब तक सरकार दुलत्तियां खाने के लिये हमारे गधे के पीछे खड़ा न करेगी , अमन क़ायम नहीं हो सकता ।
केवल राम को मासूम से कहां डर है और मासूम को रूपचंद शास्त्री का ख़ौफ़ कब है ?
लेकिन इन दोनों के बच्चों का अपहरण करने वाले ग़ुंडे हों या सरकार बनाने की हवस में क़बर में पैर और चिता में सिर रखे हुए बुड्ढे सियासतदां हों, इनकी भड़काई आग से कोई भी महफ़ूज़ नहीं है । न ये किसी का पयामे अमन सुनते हैं और न मानते हैं ।
शरीफ़ लोगों को शरीफ़ लोगों का पयामे अमन देना एक नेक काम है लेकिन मसले के हल के लिये ज़रूरी है कि समाज में इतनी बेदारी लाई जाये कि हुकूमत करने वाले या चाहने वाले सियासतदां आम भोले भाले लोगों को एक दूसरे से न लड़ा पायें और जो लड़ायें वे हमारे गधे की दुलत्तियां खायें ।

उर्दू : पर्दा भी और पुर असर भी

हमारे क़ारईन हज़रात उर्फ़ प्यारे पाठको , हम उर्दू लिखते हैं और वह भी गाढ़ी । हम ऐसा क्यों करते हैं ?
हम बताएंगे बाद में पहले आप क़यास लगा लीजिए ख़ूब अच्छी तरह और तब तक आप हमारा यह कलाम देखिए जो हमने छोड़ा है "अमन के पैग़ाम" पर ।

@ MAsoom साहेब ! हम आज सलाम करने भी आए हैं और कलाम करने भी ।
हुआ यूं कि आपके ब्लाग से धुआं उठता देखकर मेरे गधे ने अपने अंदाज़ मेँ चैट की और यहां ला छोड़ा । मैंने शेख़चिल्ली को दौड़ा दिया कि पानी और कंबल लेकर आ जाए पीछे पीछे और यहां आकर देखा तो धुआं निकला यज्ञ की आग का । सारे अंदेशे ढेर निकले औल्लो जी , केक भी काटे जा रहे हैं ।
ऐसे फ़ोटू माSUम साहेब पहले ही दिखा दिए होते तो गिरी बाबू पहले ही दोस्त बन गए होते और गिरी बाबू सैट तो समझो सब सैट । अब तो ब्लाग संसार में अमन आ ही गया समझो ।
चलता हूं फ़ायर ब्रिगेड वालों को रोक दूं वर्ना सारा केक वो ही चट कर जाएंगे और हां , हमने लिखना ज़रूर बाद में शुरू किया है ब्लागर बड़े हैं लिहाज़ा अभी मत छापिएगा हमारा पैग़ाम , हमें बाद वालों में रखना । हमारे पैग़ाम का साईज़ भी हमारी इज़्ज़त जितना ही बड़ा है। ईमानदारी से बताईये कै दिन लगे हमारे पैग़ाम को जोड़ने में ?

# पैग़ाम देने के शौक़ में हम ज़रा ज्यादा ही लंबा पैग़ाम दे बैठे । दरअस्ल हमें लंबी चीजें ही पसंद हैं फ़ितरतन और हमारे गधे को भी बल्कि उसकी गधैय्या तक को ।
ख़ैर अपनी अपनी पसंद है । आपकी पसंद क्या है ?

Wednesday, December 22, 2010

समझदारी की बातें

आज शेख़चिल्ली अपना मोबाइल चार्ज होने के लिए घर पर छोड़ कर कहीं चले गए। हम अस्तंजा फ़रमा रहे थे कि अचानक मोबाइल की बेल बजी। हम फ़ौरन साफ़ और पाक होकर मोबाइल की तरफ़ लपके कि शायद दूसरी तरफ़ से हमारी होने वाली बहू की आवाज़ ही सुनाई दे जाये लेकिन हाय रे क़िस्मत! पता चला कि दूसरी तरफ़ से दो लतीफ़े भेजे गये हैं। आप भी इन्हें पढ़कर उसी तरह अपना माथा ठोकियेगा जैसे कि हमने ठोका था। 
                                                       
                                                         समझदारी की बातें
1. एक साहब का क्रेडिट कार्ड चोरी चला गया लेकिन उन्होंने पुलिस में शिकायत नहीं की।
कारण ?
कारण यह था कि चोर उनकी बीवी से कम ख़र्च कर रहा था।

2. एक पागलख़ाने में एक पागल बीड़ी को बिना जलाए ही पी रहा था। यह देखकर दूसरे पागल ने पूछा, ‘तुम्हारी बीड़ी से धुआं तो निकल ही नहीं रहा है ?‘
पहले पागल ने जवाब दिया,‘कर दी न पागलों वाली बात, यही सीएनजी बीड़ी है।‘

Friday, December 10, 2010

जो उलझ कर रह गई है फ़ाइलों के जाल में
गांव तक वो रौशनी आएगी कितने साल में

बूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गई
रमसुधी की झोंपड़ी सरपंच की चौपाल में

खेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गए
हमको पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल में

जिसकी कीमत कुछ न हो इस भीड़ के माहौल में
ऐसा सिक्का ढालना क्या जिस्म की टकसाल में
~~~~~~~:-*
अब आपको दिक्कत आ सकती है कुछ अल्फ़ाज़ को समझने में , तो अपुन तो लफ़ड़ा ही नहीं पालता मतलब बताने का .
खुद टक्कर मारो प्यारो .

लेकिन दीवार में नहीं बल्कि इस वेबसाइट में -
www.weboword.com
इस वेबसाइट में हर शब्द को चित्र के साथ समझाया गया है .

और यह सर्च इंजन भी आपको पसंद आएगा -
www.favitt.com
यह दूसरे सर्च इंजन भी दर्शाता है और अगर दूसरे सर्च इंजनों में है वह चीज़ जो कि आप खोज रहे हैं तो पेज की दाहिनी तरफ़ उसे भी दिखाता है .

देखो , आपने एक पंथ दो काज तो देखा होगा मगर हमने कर दिए तीन तीन काज .
ख़ुश ?

Wednesday, December 8, 2010

कितने एग्रीगेटर थे ? (SHOLEY STYLE MEN) या हैं ?

आदमी हमने अपने जैसा देखा तो बस एक ही जगह देखा ।
कहां देखा ?
आईने मे देखा है बस ।
लेकिन वक़्त की बात है कि हमारी शेख़ी यानि हमारी बीवी कम महबूबा तो मायके जा बैठी और चिठ्ठाजगत ने चारपाई पकड़ ली है । लिहाज़ा हम न तो अपने जौहर अपने घर मे दिखा पा रहे है और न घर के बाहर ।
अपनी वाणी को ब्लागवाणी के पास लेकर चले गए नारद जी ।
अब कौन कौन से एग्रीगेटर ज़िंदा सलामत है और हिंदी के लिए शब्द प्रहरी बने हुए हैं ?
कौन बताएगा हमे हमारी वाणी में ?
न , न , न ।
गिरी बाबू को कुछ मत कहना । पिछली पोस्ट वे आए ज़रूर लेकिन उनका आना मै तो अपने लिए मनहूस नही मानता ।
वे आकर क्या गए मेरे गधे के तो रंग ढंग ही बदल गए।
गधे की बात छोड़िए साहिबो और ये बताओ कि ब्लागिंग के खिलाड़ी आजकल कौन कौन से एग्रीगेटर के कान खींच रहे हैं ?

Friday, December 3, 2010

Saturday, November 27, 2010

आदमीनामा


आदमी के बहुत से रूप हैं। जितने रूप असली दुनिया में हैं उतने ही इस छलावे की दुनिया में भी हैं। लोग दुखी हैं। वे दिल बहलाने की खातिर इस सच्ची झूठी दुनिया की सैर पर आते हैं और यहां भी उनकी मुठभेड़ असली दुनिया की परेशानियों से हो जाती है। झगड़े-टंटे उन्हें परेशान करते हैं, मुझे भी परेशान करते हैं। यही कारण है कि ब्लाग बनाकर भी मैं कुछ करने से बचता रहा परंतु यही तो समय है जबकि मैं कुछ सेवा कर सकता हूं। सो मैं थोड़े समय में से बहुत थोड़ा सा निकाल कर आपके जहां में कदम धर रहा हूं। मेरा स्वागत जरा ढंग से कर लीजो।
आदमीनामा
यां आदमी पे जान को वारे है आदमी
और आदमी पे तेग़ के मारे है आदमी
पगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमी
चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी
और सुन के दौड़ता है सो है वह भी आदमी
चलता है आदमी ही मुसाफ़िर ही, ले के माल
और आदमी ही मारे है फांसी गले में डाल
यां आदमी ही सैद है और आदमी है जाल
सच्चा भी आदमी ही निकलता है, मेरे लाल
और झूठ का भरा सो है वह भी आदमी